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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
सर्वं कालः समादत्ते गम्भीरः स्वेन तेजसा |  १९   क
तस्मिन्कालवशं प्राप्ते का व्यथा मे विजानतः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति