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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
दग्धमेवानुदहति हतमेवानुहन्ति च |  २०   क
नश्यते नष्टमेवाग्रे लव्धव्यं लभते नरः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति