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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
यदि मे पश्यतः कालो भूतानि न विनाशय़ेत् |  २२   क
स्यान्मे हर्षश्च दर्पश्च क्रोधश्चैव शचीपते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति