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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
इच्छन्नहं विकुर्यां हि रूपाणि वहुधात्मनः |  २४   क
विभीषणानि यानीक्ष्य पलाय़ेथास्त्वमेव मे ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति