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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
पुरा सर्वं प्रव्यथते मय़ि क्रुद्धे पुरन्दर |  २६   क
अवैमि त्वस्य लोकस्य धर्मं शक्र सनातनम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति