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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
दृश्यते हि कुले जातो दर्शनीय़ः प्रतापवान् |  ३२   क
दुःखं जीवन्सहामात्यो भवितव्यं हि तत्तथा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति