शान्ति पर्व  अध्याय २१७

वलिरु उवाच

कल्याणी रूपसम्पन्ना दुर्भगा शक्र दृश्यते |  ३४   क
अलक्षणा विरूपा च सुभगा शक्र दृश्यते ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति