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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
पश्यामि त्वा विराजन्तं देवराजमवस्थितम् |  ३७   क
श्रीमन्तं द्युतिमन्तं च गर्जन्तं च ममोपरि ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति