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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु ज्ञातिविमर्देऽस्मिन्नात्थ दुर्योधनं प्रति |  २६   क
भवन्तमनुनेष्यामि तत्रापि कुरुनन्दन ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति