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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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भीष्म उवाच
प्रीतिं प्राप्यातुलां पूर्वं लोकांश्चात्मवशे स्थितान् |  ४   क
विनिपातमिमं चाद्य शोचस्याहो न शोचसि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति