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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
संरक्षामि विलुम्पामि ददाम्यहमथाददे |  ४३   क
संय़च्छामि निय़च्छामि लोकेषु प्रभुरीश्वरः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति