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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
तदद्य विनिवृत्तं मे प्रभुत्वममराधिप |  ४४   क
कालसैन्यावगाढस्य सर्वं न प्रतिभाति मे ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति