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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
नाहं कर्ता न चैव त्वं नान्यः कर्ता शचीपते |  ४५   क
पर्याय़ेण हि भुज्यन्ते लोकाः शक्र यदृच्छय़ा ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति