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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
गन्भीरं गहनं व्रह्म महत्तोय़ार्णवं यथा |  ४८   क
अनादिनिधनं चाहुरक्षरं परमेव च ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति