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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
गतिं हि सर्वभूतानामगत्वा क्व गमिष्यसि |  ५१   क
यो धावता न हातव्यस्तिष्ठन्नपि न हीय़ते |  ५१   ख
तमिन्द्रिय़ाणि सर्वाणि नानुपश्यन्ति पञ्चधा ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति