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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
आहुश्चैनं केचिदग्निं केचिदाहुः प्रजापतिम् |  ५२   क
ऋतुमासार्धमासांश्च दिवसांस्तु क्षणांस्तथा ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति