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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
वहूनीन्द्रसहस्राणि समतीतानि वासव |  ५४   क
वलवीर्योपपन्नानि यथैव त्वं शचीपते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति