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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं विविधांस्तात मार्गा; न्गदाय़ुद्धे मण्डलं सञ्चरन्तम् |  १५२   क
मिथ्या हतं वासुदेवस्य वुद्ध्या; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति