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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
यामेतां प्राप्य जानीषे राजश्रिय़मनुत्तमाम् |  ५७   क
स्थिता मय़ीति तन्मिथ्या नैषा ह्येकत्र तिष्ठति ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति