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आदि पर्व
अध्याय १५५
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व्राह्मण उवाच
संहिताध्ययनं कुर्वन्वसन्गुरुकुले च यः |  १८   क
भैक्षमुच्छिष्टमन्येषां भुङ्क्ते चापि सदा सदा |  १८   ख
कीर्तय़न्गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति