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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्कन्दस्य पार्षदान्घोराञ्शृणुष्वाद्भुतदर्शनान् |  १   क
वज्रप्रहारात्स्कन्दस्य जज्ञुस्तत्र कुमारकाः |  १   ख
ये हरन्ति शिशूञ्जातान्गर्भस्थांश्चैव दारुणाः ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति