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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
षण्णां तु प्रवरं तस्य शीर्षाणामिह शव्द्यते |  १३   क
शक्तिं येनासृजद्दिव्यां भद्रशाख इति स्म ह ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति