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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येतद्विविधाकारं वृत्तं शुक्लस्य पञ्चमीम् |  १४   क
तत्र युद्धं महाघोरं वृत्तं षष्ठ्यां जनाधिप ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति