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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽव्रवीद्वाढमित्येवं भविष्यध्वं पृथग्विधाः |  ८   क
अशिवाश्च शिवाश्चैव पुनः पुनरुदारधीः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति