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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः सङ्कल्प्य पुत्रत्वे स्कन्दं मातृगणोऽगमत् |  ९   क
काकी च हलिमा चैव रुद्राथ वृहली तथा |  ९   ख
आर्या पलाला वै मित्रा सप्तैताः शिशुमातरः ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति