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आदि पर्व
अध्याय २१८
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वैशम्पाय़न उवाच
निष्प्रतीकारहृष्टश्च हुतभुग्विविधाकृतिः |  १८   क
प्रजज्वालातुलार्चिष्मान्स्वनादैः पूरय़ञ्जगत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति