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आदि पर्व
अध्याय २१८
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वैशम्पाय़न उवाच
शरैः समन्ततः सर्वं खाण्डवं चापि पाण्डवः |  २   क
छादय़ामास तद्वर्षमपकृष्य ततो वनात् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति