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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते |  १३   क
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति