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आदि पर्व
अध्याय २१८
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वैशम्पाय़न उवाच
समुत्पाट्य तु पाणिभ्यां मन्दराच्छिखरं महत् |  ४७   क
सद्रुमं व्यसृजच्छक्रो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति