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शान्ति पर्व
अध्याय २९५
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वसिष्ठ उवाच
क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवतीमथ |  १९   क
प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथात्मनः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति