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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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शक्र उवाच
कथं त्वय़ा वलिस्त्यक्तः किमर्थं वा शिखण्डिनि |  ११   क
कथं च मां न जह्यास्त्वं तन्मे व्रूहि शुचिस्मिते ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति