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शान्ति पर्व
अध्याय १७३
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भीष्म उवाच
यदि व्राह्मण देहस्ते निरातङ्को निरामय़ः |  ३८   क
अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृतः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति