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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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श्रीरु उवाच
व्रह्मण्योऽय़ं सदा भूत्वा सत्यवादी जितेन्द्रिय़ः |  १३   क
अभ्यसूय़द्व्राह्मणान्वै उच्छिष्टश्चास्पृशद्घृतम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति