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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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श्रीरु उवाच
यज्ञशीलः पुरा भूत्वा मामेव यजतेत्ययम् |  १४   क
प्रोवाच लोकान्मूढात्मा कालेनोपनिपीडितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति