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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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श्रीरु उवाच
नैव देवो न गन्धर्वो नासुरो न च राक्षसः |  १७   क
यो मामेको विषहितुं शक्तः कश्चित्पुरन्दर ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति