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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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शक्र उवाच
तिष्ठेथा मय़ि नित्यं त्वं यथा तद्व्रूहि मे शुभे |  १८   क
तत्करिष्यामि ते वाक्यमृतं त्वं वक्तुमर्हसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति