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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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श्रीरु उवाच
स्थास्यामि नित्यं देवेन्द्र यथा त्वय़ि निवोध तत् |  १९   क
विधिना वेददृष्टेन चतुर्धा विभजस्व माम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति