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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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श्रीरु उवाच
एष मे निहितः पादो योऽय़मप्सु प्रतिष्ठितः |  २४   क
तृतीय़ं शक्र पादं मे तस्मात्सुनिहितं कुरु ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति