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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
न चैनमशकं हन्तुं तदद्भुतमिवाभवत् |  ३०   क
तस्मिन्प्रतिहते चास्त्रे विस्मय़ो मे महानभूत् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति