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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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शक्र उवाच
यथेष्टं गच्छ दैत्येन्द्र स्वस्ति तेऽस्तु महासुर |  ३४   क
आदित्यो नावतपिता कदाचिन्मध्यतः स्थितः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति