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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
अहमप्येवमेवैनं लोकं जानाम्यशाश्वतम् |  ९२   क
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति