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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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श्रीरु उवाच
भूतिर्लक्ष्मीति मामाहुः श्रीरित्येवं च वासव |  ८   क
त्वं मां शक्र न जानीषे सर्वे देवा न मां विदुः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति