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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
उपविष्टं ततः स्कन्दं हिरण्यकवचस्रजम् |  १   क
हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति