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वन पर्व
अध्याय २१८
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स्कन्द उवाच
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजय़े रतः |  १४   क
अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति