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वन पर्व
अध्याय २१८
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शक्र उवाच
वलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानामरीञ्जहि |  १५   क
अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिताः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति