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वन पर्व
अध्याय २८४
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व्राह्मण उवाच
अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात्त्वां निदर्शय़े |  २२   क
कुरुष्वैतद्वचो मे त्वमेतच्छ्रेय़ः परं हि ते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति