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वन पर्व
अध्याय १५६
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वे स्वे किल कुले जाते पुत्रे नप्तरि वा पुनः |  १२   क
पितरः पितृलोकस्थाः शोचन्ति च हसन्ति च ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति