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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
पूज्यमानं तु रुद्रेण दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः |  २८   क
रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति