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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् |  ३   क
अभजत्पद्मरूपा श्रीः स्वय़मेव शरीरिणी ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति