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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् |  ३५   क
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति